व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने पवमत्रात्मा के माध्यम से क्यों कार्य किया?

28.08.2019

व्यवस्था के युग में परमेश्वर ने पवमत्रात्मा के माध्यम से क्यों कार्य किया?

  परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के शुरूआती कार्य को सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा किया गया था, और देह के द्वारा नहीं। फिर भी, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों के अंतिम कार्य को देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया है, और आत्मा के द्वारा सीधे तौर पर नहीं किया गया है। माध्यमिक चरण के छुटकारे के कार्य को भी देहधारी परमेश्वर के द्वारा किया गया था। समूचे प्रबंधकीय कार्य के दौरान, सबसे महत्वपूर्ण कार्य है शैतान के प्रभाव से मनुष्य का उद्धार। मुख्य कार्य है भ्रष्ट मनुष्य पर सम्पूर्ण विजय, इस प्रकार यह जीते गए मनुष्य के हृदय में परमेश्वर के मूल आदर को फिर से ज्यों का त्यों करता है, और उसे एक सामान्य जीवन हासिल करने की अनुमति देता है, कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर के एक जीवधारी का सामान्य जीवन। यह कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है, और प्रबंधकीय कार्य का केन्द्रीय भाग है। उद्धार के कार्य के तीन चरणों में, व्यवस्था के कार्य का प्रथम चरण प्रबंधकीय कार्य के केन्द्रीय भाग से काफी दूर था; उसके पास उद्धार के कार्य का केवल हल्का सा रूप था, और यह शैतान के प्रभुत्व से मनुष्य को बचाने हेतु परमेश्वर के कार्य का आरम्भ नहीं था। पहले चरण के कार्य को सीधे तौर पर आत्मा के द्वारा किया गया था क्योंकि, व्यवस्था के अन्तर्गत, मनुष्य केवल इतना जानता था कि व्यवस्था में बने रहना था, और उसके पास और अधिक सच्चाई नहीं थी, और क्योंकि व्यवस्था के युग में कार्य मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तनों को बमुश्किल ही शामिल करता था, और यह उस कार्य से तो बिलकुल भी सम्बन्धित नहीं था कि किस प्रकार मनुष्य को शैतान के प्रभुत्व से बचाया जाए। इस प्रकार परमेश्वर के आत्मा ने इस अत्यंत साधारण चरण के कार्य को पूरा किया था जो मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से सम्बन्धित नहीं था। इस चरण के कार्य ने प्रबंधन के केन्द्रीय भाग से थोड़ा सा सम्बन्ध रखा था, और इसका मनुष्य के उद्धार के आधिकारिक कार्य से कोई बड़ा परस्पर सम्बन्ध नहीं था, और इस प्रकार इसे आवश्यकता नहीं थी कि परमेश्वर अपने कार्य को व्यक्तिगत रीति से अंजाम देने के लिए देह धारण करे।

"भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है" से

  व्यवस्था के युग में परमेश्वर एक ही था जिसे मनुष्य के द्वारा न तो देखा जा सकता था और न ही छुआ जा सकता था। वह केवल शैतान द्वारा पहले भ्रष्ट किए गए मनुष्य की अगुवाई करता था, और वह वहाँ उन मनुष्य को निर्देश देने और उनकी चरवाही करने के लिए था, इसलिए जो वचन उसने कहे वे केवल विधान, अध्यादेश और मनुष्य के रूप में जीवन जीने का सामान्य ज्ञान थे, और उस सत्य के बिल्कुल नहीं थे जो मनुष्य को जीवन प्रदान करता है। उसकी अगुवाई में इस्राएली वे नहीं थे जिन्हें शैतान के द्वारा गहराई तक भ्रष्ट किया गया था। उसका व्यवस्था का कार्य उद्धार के कार्य में केवल सबसे पहला चरण, उद्धार के कार्य का एकदम आरम्भ था, और इसका व्यावहारिक रूप से मनुष्य के जीवन स्वभाव में परिवर्तनों से कुछ लेना-देना नहीं था। इसलिए, उद्धार के कार्य के आरम्भ में उसे इस्राएल में अपने कार्य के लिए देहधारण करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। इसी लिए उसे एक माध्यम की आवश्यकता थी, अर्थात्, एक उपकरण की, जिसके माध्यम से मनुष्य के साथ सम्पर्क किया जाए। इस प्रकार, सृजन किए गए प्राणियों के मध्य ऐसे लोग उठ खड़े हुए जिन्होंने यहोवा की ओर से बोला और कार्य किया, और इस तरह से मनुष्य के पुत्र और भविष्यद्वक्ता मनुष्यों के मध्य कार्य करने के लिए आए। मनुष्य के पुत्रों ने यहोवा की ओर से मनुष्यों के मध्य कार्य किया। परमेश्वर के द्वारा ऐसा बुलाए जाने का अर्थ है कि ऐसे मनुष्य यहोवा की ओर से व्यवस्था निर्धारित करते हैं और ये मनुष्य इस्राएली लोगों के बीच याजक भी थे; ऐसे याजकों का यहोवा के द्वारा ध्यान रखा जाता था, और उनकी रक्षा की जाती थी, और यहोवा के आत्मा द्वारा उनमें कार्य किया जाता था; वे लोगों के मध्य अगुवे थे और सीधे यहोवा की सेवा करते थे। दूसरी ओर, भविष्यद्वक्ता वे थे जो सभी देशों और सभी कबीलों में यहोवा की ओर से मनुष्यों से बातचीत करने के लिए समर्पित थे। ये वे लोग भी थे जिन्होंने यहोवा के कार्य की भविष्यवाणी की थी। चाहे ये मनुष्य के पुत्र हों या भविष्यद्वक्ता, सभी को स्वयं यहोवा की आत्मा के द्वारा ऊपर उठाया गया था और उनमें यहोवा का कार्य था। लोगों के मध्य, ये वे लोग थे जो सीधे यहोवा का प्रतिनिधित्व करते थे; वे केवल कार्य इसलिए करते थे क्योंकि उन्हें यहोवा ने ऊपर उठाया था और इसलिए नहीं कि वे ऐसी देह थे जिसमें स्वयं पवित्र आत्मा ने देहधारण किया था। इसलिए, हालाँकि वे परमेश्वर की ओर से एक-समान रूप से बोलते और कार्य करते थे, किन्तु व्यवस्था के युग में ये मनुष्य के पुत्र और भविष्यद्वक्ता देहधारी परमेश्वर की देह नहीं थे।

"देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से

  पुराने नियम के व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा के द्वारा बड़ी संख्या में खड़े किए गए भविष्यद्वक्ताओं ने उसके लिए भविष्यवाणी की, उन्होंने विभिन्न कबीलों एवं राष्ट्रों को निर्देश दिए, और उस कार्य की भविष्यवाणी की जो यहोवा करेगा। ये लोग जिन्हें खड़ा किया गया था, उन सभी को यहोवा के द्वारा भविष्यवाणी का पवित्रात्मा दिया गया थाः वे यहोवा से परिकल्पनाओं को देखने, और उसकी आवाज़ को सुनने में समर्थ थे, और इस प्रकार वे उसके द्वारा प्रेरित थे और उन्होंने भविष्यवाणियों को लिखा। उन्होंने जो कार्य किया वह यहोवा की आवाज़ की अभिव्यक्ति था, यह उस भविष्यवाणी का कार्य था जिसे उन्होंने यहोवा की ओर से किया था, और उस समय यहोवा का कार्य केवल पवित्रात्मा का उपयोग करके लोगों को मार्गदर्शन करना था; वह देहधारी नहीं हुआ, और लोगों ने उसके चेहरे में से कुछ भी नहीं देखा। इस प्रकार, उसने अपना कार्य करने के लिए बहुत से भविष्यद्वक्ताओं को खड़ा किया, और उन्हें आकाशवाणियाँ दीं जो उन्होंने इस्राएल के प्रत्येक कबीले और कुटुम्ब को सौंप दी। उनका कार्य भविष्यवाणी कहना था, और उन में से कुछ ने अन्य लोगों को दिखाने के लिए यहोवा के निर्देशों को लिख लिया। यहोवा ने इन लोगों को भविष्यवाणी करने, भविष्य के कार्य या उस कार्य के बारे में पूर्वकथन कहने के लिए खड़ा किया था जो उस युग के दौरान अभी किया जाना था, ताकि लोग यहोवा की चमत्कारिकता एवं बुद्धि को देख सकें।

"बाइबल के विषय में (1)" से

  व्यवस्था के युग में यहोवा ने परमेश्वर के कार्य के एक भाग को किया था, जिसके पश्चात् उसने कुछ वचनों को कहा और भविष्यवक्ताओं के जरिए कुछ कार्य किया। यह इसलिए है क्योंकि मनुष्य यहोवा के कार्य के एवज़ में खड़ा हो सकता था, और दर्शी लोग उसके स्थान पर आने वाली बातों को बता सकते थे और कुछ स्वप्नों का अनुवाद कर सकते थे। आरम्भ में किया गया कार्य सीधे तौर पर मनुष्य के स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य नहीं था, और मनुष्य के पाप से सम्बन्धित नहीं था, और मनुष्य से सिर्फ व्यवस्था में बने रहने की अपेक्षा की गई थी। अतः यहोवा ने देहधारण नहीं किया और स्वयं को मनुष्य पर प्रगट नहीं किया; इसके बजाय उसने मूसा एवं अन्य लोगों से सीधे बातचीत की, तथा उनसे बुलवाया और अपने स्थान पर कार्य करवाया, और उनसे मानवजाति के मध्य सीधे तौर पर कार्य करवाया। परमेश्वर के कार्य का पहला चरण मनुष्य के नेतृत्व का था। यह शैतान के साथ युद्ध का आरम्भ था, परन्तु यह युद्ध अभी तक आधिकारिक रूप से शुरू नहीं हुआ था। परमेश्वर के पहले देहधारण के साथ ही शैतान के साथ आधिकारिक युद्ध का आरम्भ हो गया था, और यह आज के दिन तक निरन्तर जारी है। इस युद्ध का पहला उदाहरण तब सामने आया जब देहधारी परमेश्वर को क्रूस पर कीलों से जड़ दिया गया था। देहधारी परमेश्वर के क्रूसारोहण ने शैतान को पराजित कर दिया था, और यह युद्ध में प्रथम सफल चरण था। जब देहधारी परमेश्वर ने मनुष्य के जीवन में सीधे तौर पर कार्य करना आरम्भ किया, तो यह मनुष्य को पुनः प्राप्त करने के कार्य की आधिकारिक शुरुआत थी, और क्योंकि यह मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य है, इसलिए यह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य है। कार्य का यह चरण जिसे आरम्भ में यहोवा के द्वारा किया गया था वह महज पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन का नेतृत्व था। यह परमेश्वर के कार्य का आरम्भ था, और हालाँकि इसमें अब तक किसी युद्ध, या किसी मुख्य कार्य को शामिल नहीं गया था, फिर भी इसने उस आने वाले युद्ध के कार्य की नींव डाली थी।

"मनुष्य के सामान्य जीवन को पुनःस्थापित करना और उसे एक बेहतरीन मंज़िल पर ले चलना" से

स्रोत: सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया

  अधिक: परमेश्वर के भजन - नये युग में स्तुति - प्रभु की वापसी का स्वागत करें

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